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Monday, February 9, 2026

गुजरात: 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में 30 साल की सज़ा, बरी होने के अगले ही दिन मौ*त — इंसाफ़ ने फिर रुलाया

गुजरात: 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में 30 साल की सज़ा, बरी होने के अगले ही दिन मौत — इंसाफ़ ने फिर रुलाया
गुजरात : गुजरात से न्याय व्यवस्था को झकझोर देने वाला एक बेहद दर्दनाक मामला सामने आया है।
यह कहानी है बाबूभाई प्रजापति की—एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने महज़ 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में अपनी ज़िंदगी के करीब 30 साल जेल और अदालतों के चक्कर में गंवा दिए, और जब अदालत ने आखिरकार उसे निर्दोष मानते हुए बरी किया, तो आजादी की सांस लेने से पहले ही मौत ने उसे गले लगा लिया।
1996 का मामला, जिसने पूरी जिंदगी बदल दी
बाबूभाई प्रजापति गुजरात पुलिस में कांस्टेबल के पद पर तैनात थे।
साल 1996 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने 20 रुपये की रिश्वत ली है।
यह छोटा-सा आरोप उनके पूरे जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बन गया।
मामला दर्ज हुआ, गिरफ्तारी हुई और फिर शुरू हुआ 30 साल लंबा कानूनी संघर्ष।
इस दौरान बाबूभाई को जेल की सलाखों के पीछे लंबा समय बिताना पड़ा, नौकरी चली गई, सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म हो गई और परिवार आर्थिक व मानसिक पीड़ा से जूझता रहा।
तीन दशक बाद मिला इंसाफ
करीब 30 साल बाद, अदालत ने मामले की दोबारा समीक्षा करते हुए बाबूभाई प्रजापति को पूरी तरह निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया।
कोर्ट ने माना कि उनके खिलाफ रिश्वत लेने का कोई ठोस प्रमाण नहीं था।
यह फैसला बाबूभाई और उनके परिवार के लिए उम्मीद की एक किरण लेकर आया।
लगा कि अब बाकी बची ज़िंदगी सुकून से कटेगी।
लेकिन आज़ादी ज्यादा देर टिक नहीं सकी
दुर्भाग्यवश, जेल से रिहा होने के महज़ एक दिन बाद ही बाबूभाई प्रजापति का निधन हो गया।
बताया जा रहा है कि लंबे समय से चली आ रही मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक थकान ने उनकी जान ले ली।
परिवार का कहना है कि
“जिस इंसाफ़ का इंतज़ार उन्होंने 30 साल किया, उसे जीने का मौका ही नहीं मिला।”
सवालों के घेरे में न्याय व्यवस्था
यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
क्या 20 रुपये के आरोप में 30 साल की सज़ा न्याय है?
अगर कोई निर्दोष है, तो उसे इंसाफ़ मिलने में इतनी देर क्यों?
क्या इस देरी की कीमत किसी की पूरी जिंदगी से वसूली जाएगी?
बाबूभाई प्रजापति को भले ही अदालत ने निर्दोष घोषित कर दिया हो,
लेकिन न तो उन्हें खोई हुई जिंदगी लौटाई जा सकती है,
न ही उनके परिवार के टूटे हुए सपने।
इंसाफ़ मिला, मगर बहुत देर से
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं,
बल्कि हमारी न्याय व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
इंसाफ़ अगर देर से मिले, तो क्या वह इंसाफ़ कहलाता है?

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