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Friday, February 20, 2026

21 फरवरी – अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में अपनी मातृभाषा हिंदी : गौरव और आत्मसम्मान का आधार

21 फरवरी – अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में
अपनी मातृभाषा हिंदी : गौरव और आत्मसम्मान का आधार
लेखक - डॉ. अशोक कुमार वर्मा
dr.ashokkumar.kavi@gmail.com  
9053115315

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रत्येक वर्ष 21 फरवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व की सभी भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा को बढ़ावा देना है। इस दिवस की घोषणा UNESCO द्वारा की गई थी। इसकी प्रेरणा बांग्लादेश के ऐतिहासिक भाषा आंदोलन से जुड़ी है, जहाँ मातृभाषा के सम्मान हेतु विद्यार्थियों ने बलिदान दिया। आज भारत को स्वतंत्र हुए लगभग 79 वर्ष होने जा रहे हैं, परंतु यह चिंतन का विषय है कि अभी भी अधिकांश क्षेत्रों में अंग्रेज़ी भाषा का प्रभुत्व दिखाई देता है। यद्यपि प्रत्येक वर्ष बैंकों, सरकारी एवं अर्ध-सरकारी संस्थानों में हिंदी पखवाड़ा मनाकर हिंदी के प्रयोग पर बल दिया जाता है, किंतु इसके परिणाम अपेक्षित रूप में सामने नहीं आ पाते।
*भाषा और संस्कार* जब कोई बालक जन्म लेता है, तभी से उसके परिवेश में भाषा के संस्कार अंकित होने लगते हैं। माता-पिता और आसपास के लोग यदि प्रारंभ से ही अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देते हैं, तो स्वाभाविक है कि बालक की सोच और अभिव्यक्ति उसी दिशा में विकसित होगी। यह सत्य है कि बचपन में डाले गए संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। आज अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में हिंदी विषय को छोड़कर लगभग सभी विषय अंग्रेज़ी में पढ़ाए जाते हैं। परिणामस्वरूप बालक के मन में यह धारणा घर कर जाती है कि समाज में उच्च स्थान, आधुनिक जीवन शैली और प्रतिष्ठा के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान अनिवार्य है। ऐसे में हिंदी का ज्ञान तो प्राप्त हो जाता है, परंतु व्यवहार में अंग्रेजी को अधिक महत्व दिया जाता है। आज अंग्रेज़ी में बोलने और कार्य करने वाले व्यक्ति को ही अधिक शिक्षित और प्रगतिशील माना जाने लगा है।

*हिंदी की व्यापकता और सांस्कृतिक परंपरा* हिंदी केवल उत्तर भारत की भाषा नहीं है। दक्षिण भारत के आचार्यों—वल्लभाचार्य, रामानुज तथा रामानंद —ने लोकभाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया। इसी प्रकार विभिन्न राज्यों के संत-कवियों ने भी हिंदी को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। महाराष्ट्र के नामदेव और बंगाल के चैतन्य महाप्रभु सहित अनेक संतों ने जनभाषा के माध्यम से भक्ति और साहित्य की धारा को प्रवाहित किया। इससे स्पष्ट है कि हिंदी सदैव सांस्कृतिक एकता की धुरी रही है।
हिंदी की जननी संस्कृत है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला है। आज विश्व के अनेक संस्थानों में संस्कृत और हिंदी के अध्ययन में रुचि बढ़ रही है। यह हमारे लिए गौरव का विषय है, किंतु विडंबना यह है कि हम स्वयं अपनी भाषाओं की अपेक्षा अंग्रेज़ी को अधिक महत्व देने लगे हैं।
  *न्यायपालिका और प्रशासन में हिंदी* संसद में अनेक अवसरों पर हिंदी को न्यायपालिका और प्रशासन में बढ़ावा देने की मांग उठी है। संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है, किंतु उच्चतम न्यायालय एवं कई प्रशासनिक स्तरों पर अंग्रेज़ी का ही अधिक प्रयोग होता है। कुछ राज्यों—उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश—के उच्च न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग की अनुमति एक सकारात्मक कदम है। फिर भी यह आवश्यक है कि शासन और न्याय व्यवस्था आमजन की भाषा में अधिक सुलभ हो, ताकि नागरिक अपनी बात सहजता से रख सकें।
*निष्कर्ष*
यदि हम गहराई से विचार करें तो पाएंगे कि हिंदी व्यवहारिक रूप में राजभाषा तक सीमित रह गई है। अन्य भाषाओं का सम्मान करना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है, परंतु अपनी भाषा को पूर्ण रूप से स्थापित किए बिना संतुलित भाषायी नीति संभव नहीं है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि—
• हम अपने दैनिक जीवन में हिंदी का सम्मान पूर्वक प्रयोग करेंगे।
• नई पीढ़ी में मातृभाषा के प्रति गर्व की भावना विकसित करेंगे।
• प्रशासन और न्याय व्यवस्था में हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित करेंगे।
मातृभाषा हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति की आत्मा है और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है।
आइए, इस पावन अवसर पर हिंदी के संरक्षण और संवर्धन का दृढ़ संकल्प लें।

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