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Wednesday, February 4, 2026

कविता- चाँद-सा हुआ सूरज

कविता- चाँद-सा हुआ सूरज
कविता रचयिता- डॉ. अशोक कुमार वर्मा
9053115315

लालिमामय सूरज भरी सर्दी में
आज चाँद-सा शीतल हो गया।
सुनहरा भास्कर शीतलहर में
स्वयं ही चांदी में खो गया।

न ज्वाला रही जो तपिश दे,
हुआ सुनहरे रंग का अहं भंग।  
बेबस कुहासे की मृदु गोद में
यथा वृद्ध का बल छोड़े संग।

ठिठकी धरती, थमी दिशाएँ,
हवा भी जैसे सोच रही,
उजाले की इस नरमी में
सृष्टि स्वयं को खोज रही।

भीषण गर्मी में तपता सूरज,
यथा नभ में दहकता अंगार।
व्याकुल प्राणी ढूँढ़ते फिरते,
वृक्ष-छाया का क्षणिक उपहार।

वक्त बदलते देर न लगती,
नीयत भी करवट ले लेती है।
प्रकृति के स्वभाव-सा सूरज,
मनुष्य प्रवृति-सा ढलती है।

जो दुपहरी में पल न सुहाए,
जिससे आँखें मूँद ली जातीं।
ठिठुरती सर्दी के मौसम में,
उसी की राहें देखी जातीं।

लालिमामय सूरज आज,
भरी सर्दी में ऐसा ढला—
कि अग्नि का वह गोला भी,
चाँद-सा शीतल हो चला।

सूरज ने चुप रहकर कहा—
नित जलना ही जीवन नहीं,
कभी-कभी कम चमकना भी
सबसे सुंदर संकल्प यही।

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