शाबाश....जींद की बेटी रेनू ...आपने कर दिखाया
जींद की रेनू रेढू ने 6,593 मीटर ऊंची माउंट मनीरंग की फतह
जींद : जींद की मूल निवासी 38 वर्षीय रेनू रेढू ने हिमाचल प्रदेश की 6,593 मीटर ऊंची माउंट मनीरंग चोटी पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की है। तीन सदस्यीय टीम के साथ की गई यह चढ़ाई अल्पाइन शैली में पूरी की गई। जींद में उनके पिता डा. राज सिंह रेढू ने बताया कि रेनू और उनकी टीम ने 29 अगस्त को सुबह सात बजे मनीरंग के शिखर पर पहुंच कर तिरंगा फहराया। टीम ने रात एक बजे समिट कैंप से अंतिम चढ़ाई शुरू की और करीब छह घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद सुबह सात बजे शिखर पर पहुंची। माउंट मनीरंग हिमाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण ऊंची चोटियों में शामिल है और यह किन्नौर और स्पीति के बीच स्थित है। चोटी ऐतिहासिक मनीरंग दर्रे के आसपास के क्षेत्र में स्थित हैए जो पारंपरिक रूप से किन्नौर और स्पीति को जोडऩे वाले मार्गों में से एक रहा है।
मनीरंग की चढ़ाई केवल ऊंचाई के कारण चुनौतीपूर्ण नहीं है। इसके रास्ते में मोरेन, ढलानदार मलबा और चट्टानी भूभाग के साथ बर्फ व बर्फीली ढलानें और खुले, संकरे रिज जैसे हिस्से मिलते हैं। अलग-अलग मार्गों पर चढ़ाई की कठिनाई परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। ऊंचाई पर मौसम में अचानक बदलाव, कम तापमान, ऑक्सीजन की कमी, रास्ते की पहचान और बर्फ की स्थिति जैसी बातें चढ़ाई को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।
रेनू ने अपने दो साथियों के साथ इस चढ़ाई को छोटे दल के रूप में पूरा किया। अल्पाइन शैली में की जाने वाली पर्वतारोहण में बड़े अभियान दल और व्यापक सहायक ढांचे के बजाय छोटा दल अपने उपकरणों और आवश्यक सामान के साथ चढ़ाई करता है। ऐसे अभियानों में मौसम, मार्ग, गति और सुरक्षा से जुड़े फैसले टीम को स्वयं लेने होते हैं। रेनू का पर्वतारोहण से जुड़ाव केवल व्यक्तिगत चढ़ाइयों तक सीमित नहीं है। उन्होंने एमएससी और एमबीए की पढ़ाई मुंबई के प्रतिष्ठित संस्थान से की है। इसके साथ ही उन्होंने बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स, एडवांस्ड माउंटेनियरिंग कोर्स, मेथड ऑफ इंस्ट्रक्शन जैसे पर्वतारोहण प्रशिक्षण हासिल किए हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड अलाइड स्पोट्र्स और नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग जैसे संस्थानों में प्रशिक्षण लिया है। अपने रूष्ट प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षु चुना गया था। फिलहाल रेनू हिमाचल प्रदेश के मनाली में रहती हैं और अपनी आउटडोर कंपनी पहाड़ी भेड़ू चलाती हैं। उनका काम पर्वतीय और आउटडोर गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। जिसके कारण वह पेशेवर रूप से भी हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं। माउंट मनीरंग की पहली दर्ज चढ़ाई सितंबर 1952 में दक्षिण-पश्चिमी रिज से मनीरंग दर्रे की ओर से की गई थी। इसके बाद पर्वतारोहण दलों ने किन्नौर और स्पीति, दोनों ओर से अलग-अलग मार्गों के जरिये इस चोटी पर चढ़ाई की है।
रेनू के लिए मनीरंग का यह अभियान किसी रिकॉर्ड की दौड़ से अधिक पर्वतारोहण के क्षेत्र में उनके निरंतर अनुभव का हिस्सा है। जींद से निकल कर मनाली को अपना आधार बनाना और हिमालय की ऊंची चोटियों पर चढ़ाई के सा-.साथ आउटडोर क्षेत्र में काम करना उनके अब तक के सफर को दर्शाता है। जींद की धरती से हिमालय की 6,593 मीटर ऊंची चोटी तक पहुंचने वाली रेनू की यह यात्रा यह भी दिखाती है कि पर्वतारोहण में उपलब्धियां अक्सर एक दिन में नहीं बनती। इसके पीछे प्रशिक्षण, तैयारी, अनुभव और लगातार पहाड़ों में सीखने की प्रक्रिया होती है।
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