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Thursday, April 29, 2021

किसानों के नाम पर मंडी में घुसते रहे UP के ट्रैक्टर; 4 घंटे फोन पर फोन

हरियाणवी किसानों के नाम पर मंडी में घुसते रहे UP के ट्रैक्टर; 4 घंटे फोन पर फोन किए तो टूटी मार्केट कमेटी के सेक्रेटरी की नींद

करनाल :  गेहूं खरीद में फर्जीवाड़ा सामने आया है। पता चला है कि बुधवार को एक के बाद हरियाणावी किसानों के नाम पर पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के किसानों के ट्रैक्टर मंडी में घुसते रहे। SDM, DC और यहां तक कि जेनल एडमिनिस्ट्रेटर सब कोरोना सेफ्टी प्रोटोकॉल की ड्यूट में व्यस्त थे। नाराज स्थानीय लोगों ने मार्केट कमेटी के सेक्रेटरी को भी एक-दो बर नहीं, बल्कि पूरे 4 घंटे तक फोन पर फोन किए, तब कहीं उनकी नींद टूटी। हालांकि, तब तक उत्तर प्रदेश का 12 हजार क्विंटल गेहूं मंडी में उतर चुका था। स्थानीय किसानों और आढ़तियों ने इस फर्जीवाड़े पर कार्रवाई की मांग की है।

करनाल मंडी में बुधवार को फर्जीवाड़ा सुबह से चल रहा था। सरेआम UP के गेहूं की एंट्री हरियाणा के किसानों के नाम पर कटे गेट पास होती रही। मार्केट कमेटी के सेक्रेटरी सुरेंद्र सिंह ऑफिस में बैठकर यह देखते रहे। सुबह से दोपहर तक 100 से ज्यादा ट्रॉलियां पास कर दी गई। गेट नंबर एक से ही ऐसा करीब 12 हजार क्विंटल गेहूं मंडी में उतर गया। इस फर्जीवाड़े की सूचना SDM, डिप्टी कमिश्नर और जोनल एडमनिस्ट्रेटर को दी गई, लेकिन सब कोरोना की ड्यूटी पुगाने में लगे थे।

इन अधिकारियों ने सेक्रेटरी पर फोन किए गए तो सेक्रेटरी 4 घंटे की देरी से गेट नंबर एक पर पहुंचे। उन्होंने UP के गेहूं को कांटे पर तुलने से रोका और मंडी से बाहर ले जाने की बात कही तो सेक्रेटरी को जवाब दिया गया कि यह आढ़ती ने मंगवाया है। नतीजा यह हुआ कि सेक्रेटरी सब देखते रहे।
पता चलने पर करनाल में इस फर्जीवाड़े पर आढ़तियों ने भी हैरानी जताई। आरोप लगाया कि इस फर्जीवाड़े के लिए करीब 20 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से रिश्वत ली जा रही है। वैसे भी यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी करनाल और घरौंडा की मंडी में उत्तर प्रदेश का माल बिकता रहा है। गेट पास हरियाणा के किसानों के नाम पर कटते हैं।

पैसा हरियाणा के किसानों के ही खाते में ही आता है और इसकी गारंटी आढ़ती की होती है। सूत्रों के मुताबिक गहनता से जांच की जाए तो मिलेगा कि बहुत से व्यापारी UP से 1910 रुपए प्रति क्विंटल गेहूं खरीदकर प्रदेश की सरकार को 1975 रुपए में बेच रहे हैं। इस खेल में संबंधित अधिकारियों का पैसा फिक्स है। इस सिस्टम को समझने में सरकार की एजेंसियां भी फेल साबित हो रही हैं।

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