August 01, 2026
*गुरु-परम्परा, प्रेमचंद की जनचेतना और ऊधम सिंह के राष्ट्रबोध का संगम बनी साहित्य परिषद की गोष्ठी*
*गुरु-परम्परा, प्रेमचंद की जनचेतना और ऊधम सिंह के राष्ट्रबोध का संगम बनी साहित्य परिषद की गोष्ठी*
*प्रत्यक्ष और ऑनलाइन माध्यम से जुड़े साहित्यकारों ने भारतीय ज्ञान-परम्परा, प्रेमचंद के साहित्य और शहीद ऊधम सिंह के राष्ट्रसमर्पण पर किया सार्थक विमर्श*
*जींद। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जींद इकाई द्वारा आयोजित वैचारिक गोष्ठी साहित्य, संस्कार और राष्ट्रचेतना के त्रिवेणी-संगम के रूप में सम्पन्न हुई। गुरु-परम्परा की ज्ञानधारा, कथा-सम्राट प्रेमचंद की लोक-संवेदना तथा अमर शहीद ऊधम सिंह के अदम्य राष्ट्रबोध को केंद्र में रखकर साहित्यकारों ने इनके सांस्कृतिक, सामाजिक और समकालीन महत्त्व पर विचार व्यक्त किए। प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन,दोनों माध्यमों से हुई सहभागिता ने गोष्ठी को व्यापक और आत्मीय स्वरूप प्रदान किया।
गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षक शशि शर्मा जी ने की। उन्होंने भारतीय गुरु-परम्परा को ज्ञान के साथ संस्कार, विवेक और जीवन-दृष्टि के हस्तांतरण की अनूठी परम्परा बताया।प्रेमचंद ने मनुष्य और समाज की पीड़ा, संघर्ष तथा स्वाभिमान को साहित्य में स्वर दिया, जबकि ऊधम सिंह ने राष्ट्र के स्वाभिमान के लिए अपने प्राण अर्पित कर देशभक्ति की अमिट गाथा लिखी।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर मंजुलता ने अपने विशेष संबोधन में कहा कि *गुरु भारतीय ज्ञान-परम्परा का वह प्रकाश है जो शिष्य के भीतर विवेक जगाकर उसे स्वयं प्रकाश बाँटने योग्य बनाता है। गुरु वह चेतना है जो प्रश्नों को दृष्टि देती है, ज्ञान को आचरण से जोड़ती है और मनुष्य के भीतर छिपे श्रेष्ठ को जागृत करती है। साहित्य भी इसी गुरु-परंपरा का संवाहक है; वह शब्द को संस्कार, विचार को विवेक और अनुभूति को लोकमंगल की दिशा देता है।प्रेमचंद को उन्होंने मानव जीवन की अंतरात्मा का कथाकार बताते हुए कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को राजमहलों से निकालकर खेत की मेड़, किसान की झोपड़ी, स्त्री की पीड़ा, मज़दूर के श्रम और अभाव से जूझते सामान्य मनुष्य के जीवन तक पहुँचाया।महान उपन्यास कार प्रेमचंद आज भी हर उस प्रश्न में जीवित हैं जहाँ मनुष्य की गरिमा, न्याय और संवेदना की बात उठती है। अमर शहीद ऊधम सिंह को नमन करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ व्यक्तित्व अपना जीवन जीकर विदा नहीं होते, बल्कि अपने संकल्प और बलिदान से पीढ़ियों के स्वाभिमान में जीवित रहते हैं।*
*जिस दिन गुरु की सीख ने, छू लिया व्यवहार।*
*उस दिन समझो ज्ञान ने, पाया सही आकार॥*
मंदिर-मंदिर खोजते, थक जाए संसार।
गुरु भीतर संकेत दे—यहीं प्रभु का द्वार॥*
जींद इकाई की अध्यक्ष मंजु मानव ने सभी साहित्यकारों का आत्मीय स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य परिषद का दायित्व केवल साहित्य-सृजन तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा, संस्कार, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव को नई पीढ़ी तक पहुँचाना भी है। उन्होंने गाया..
*कायरता को त्याग स्वयं को एक नया विश्वास दिया है।*
*जग को परखना छोड़ स्वयं को जीने का एक साज़ दिया है*
गोष्ठी का मधुर एवं सुव्यवस्थित संचालन इकाई महामंत्री डॉ. क्यूटी ने किया। विभिन्न प्रसंगों को सुंदर सूत्र में पिरोते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य अपनी परम्परा से शक्ति ग्रहण करते हुए वर्तमान से संवाद करे और भावी पीढ़ी के भीतर मानवीय तथा राष्ट्रीय मूल्यों का संस्कार जगाए,तभी उसकी सामाजिक भूमिका पूर्ण होती है।मधुरता का प्रसार करते हुए सुरीले कंठ से गुरू के चरणों में भाव प्रस्तुति दी।
क्यूटी
मन के वचन गुरु दे जीवन संवार लइए
तक्किए न दुजयाँ नू
खुद नू सुधार लइए ।
प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित दीपिका ने गुरु को जीवन की दिशा और आत्मविश्वास का आधार बताया। आरोही ने गुरु-भजन प्रस्तुत कर वातावरण को भावविभोर किया और डॉ. मनीषा ने प्रेमचंद की समकालीनता पर विचार रखते हुए कहा कि उनके पात्र आज भी समाज की विषमताओं, संघर्षों और मनुष्य की जिजीविषा के बीच हमारे आसपास जीवित दिखाई देते हैं।शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाली अनीता सांगवान और आदरणीया सोना चहल जी ने गुरू की महिमा का गुणगान किया।
ऑनलाइन माध्यम से जुड़े साहित्यकारों ने भी गोष्ठी को विविध वैचारिक आयाम प्रदान किए।
राष्ट्रीयता को जीवन में प्रथम रखने वाली साहित्यकार कविता शर्मा जी ने गुरु-परम्परा और भारतीय संस्कृति के गहरे संबंध को रेखांकित करते हुए गुरु को जीवन-पथ का प्रकाश-स्तंभ बताया।पूर्व प्राचार्य डॉ. अनीता शर्मा ने गुरु-परम्परा को भारतीय संस्कृति की अविच्छिन्न ज्ञान-श्रृंखला बताते हुए उसके संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया। विदुषी एवं प्रेरणा स्त्रोत डॉ प्रेमलता जी ने गुरु के प्रति श्रद्धा को विनय, संस्कार और जीवन-मूल्यों से बखूबी जोड़ा। प्रो० अंजलि गुप्ता ने माता-पिता को जीवन के प्रथम गुरु बताते हुए कहा कि मनुष्य की पहली पाठशाला परिवार और प्रथम शिक्षा संस्कारों की होती है।
समाज सेवी मनीषा मलिक ने जीवन में गुरू के स्थान और महिमा का गुणगान किया तथा प्रेमचंद के साहित्य में निहित सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदना पर विचार व्यक्त किए। डॉ. शिवनीत सिंह ने साहित्य की राष्ट्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्यकार अपने समय का केवल दर्शक नहीं, समाज की चेतना का सजग संवाहक भी है। डॉ. ब्रजपाल ने गुरु-परम्परा को ज्ञान के साथ चरित्र-निर्माण की भारतीय पद्धति बताया। प्रियंका ने नई पीढ़ी में गुरु के प्रति श्रद्धा और साहित्य-संस्कृति के प्रति अनुराग को संस्कारित समाज की आवश्यकता बताया।प्रखर मेधावी बाल हृदयांश की सहभागिता ने इस विश्वास को और दृढ़ किया कि परम्पराएँ तभी जीवंत रहती हैं जब नई पीढ़ी उन्हें केवल विरासत के रूप में ग्रहण न करे, बल्कि अपने जीवन से आगे बढ़ाए।तिंरंगा धारी जी ने साहित्य को समय और समाज की संवेदना का दर्पण बताते हुए साहित्यकार के सामाजिक दायित्व को रेखांकित किया। हितेश हिंदुस्तानी जी ने साहित्य में राष्ट्रभाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अपनी संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा साहित्य समाज को उसकी जड़ों और दायित्वों दोनों का बोध कराता है।
*अमर शहीद ऊधम सिंह की पुण्यतिथि के संदर्भ में उनके अदम्य साहस और राष्ट्रनिष्ठा का स्मरण करते हुए उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। वक्ताओं ने उनके बलिदान को भारतीय स्वाभिमान का ऐसा अध्याय बताया, जो आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, साहस और समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा।*
*गोष्ठी में यह भाव प्रमुखता से उभरा कि गुरु-परम्परा मनुष्य को ज्ञान और संस्कार देती है, प्रेमचंद का साहित्य उसे समाज की पीड़ा देखने की संवेदना देता है और ऊधम सिंह का बलिदान राष्ट्र के लिए जीने और आवश्यकता पड़ने पर सर्वस्व अर्पित करने का साहस देता है। ज्ञान, संवेदना और राष्ट्रचेतना की यही त्रयी भारतीय जीवन-दृष्टि को पूर्णता प्रदान करती है।*
प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन जुड़े सभी साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की सक्रिय सहभागिता ने गोष्ठी को विचार, संवेदना, संस्कार और राष्ट्रभाव से सम्पन्न एक स्मरणीय साहित्यिक आयोजन बना दिया।